करोड़ों की जॉब छोड़कर बना सरपंच

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जयपुर ​हनुमान चौधरी (27 साल) के पिता की एक फोन कॉल ने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। हनुमान ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट रिजॉर्ट में मैनेजर के तौर पर काम करते थे। पिता की कॉल आने के बाद वह गांव में पंचायत चुनाव लड़ने के लिए राजस्थान वापस आ गए। हनुमान के पिता भूरा राम ने उन्हें इसलिए वापस बुलाया, क्योंकि वह खुद चुनाव नहीं लड़ सकत थे। राजस्थान सरकार ने पंचायत चुनाव के उम्मीदवारों के लिए शैक्षणिक योग्यता निर्धारित कर दी थी। नए नियम के मुताबिक पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए कम से कम 10 वीं क्लास तक पढ़ा होना जरूरी है, जबकि उन्होंने सिर्फ 8वीं तक ही पढ़ाई की थी। नए नियम की वजह से गांव के तकरीबन 85 फीसदी लोग चुनाव नहीं लड़ सकते थे। राजस्थान हाई कोर्ट ने भी सरकार के नियम में दखल देने से मना कर दिया था। हनुमान चौधरी ने एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में कहा, 'मेरे पिता ने जब मुझे फोन किया तो मैंने अपने भाई से इस बारे में बात की। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर तुम समाज सेवा करना चाहते तो यहां आ जाओ। इसके बाद मैं वापस गांव आ गया। मैंने पंचायत चुनाव लड़ा और 6000 वोटों से जीत भी हासिल की। ऑस्ट्रेलिया में मेरी ऐनुअल इनकम दो करोड़ रुपये थी।' हनुमान ने चुनाव से पहले डोर-टु-डोर कैंपेन लॉन्च किया था। उन्होंने बताया, 'मुझे पता था कि मेरे गांव में जात-पात का मसला काफी उलझा हुआ है। मेरा कैंपेन कई मामलों में अलग था। मैंने किसी से जाति के आधार पर वोट डालने की अपील नहीं की। मैंने न ही जाति की बात की ना ही राजपूत और जाटों के बीच दुश्मनी की। मैंने हर शख्स से विकास के मुद्दों की बात की। मैं जाट समुदाय से आता हूं। मेरे विरोधी उम्मीदवार राजपूत थे। राजस्थान की राजनीति में जाटों और राजपूतों में हमेशा से दुश्मनी रही है।' युवा, शिक्षित और इंग्लिश-स्पीकिंग हनुमान ने वोटर्स को प्रभावित किया और चुनाव जीत लिया। गांव के मंगरा राम(23 साल) ने कहा, 'अगर कोई अशिक्षित व्यक्ति सरपंच बनता है तो वह जयपुर जाकर ऑफिसरों और मंत्रियों से बातचीत नहीं कर पाएगा।' हनुमान चौधरी ने भले ही गांव के लोगों को प्रभावित किया हो और चुनाव जीत लिया हो लेकिन गांव की जातीय राजनीति और बेहाल गांव अभी भी उनके सामने चुनौती बनकर खड़ा है।
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