समस्या के पीछे षणयंत्र का खेल

दिल्ली की सड़कों पर युद्ध छिड़ा हुआ है। ये युद्ध है पानी को लेकर ठीक वैसा ही जैसा कुछ साल पहले
बिजली को लेकर छिड़ा था। जगह जगह त्राहिमाम त्राहिमाम के दृश्य नजर आ रहे हैं। नेता सड़कों पर उतर कर मटके फोड़ रहे हैं, पाइपलाइन से लीक हो रहे पानी से नहा भी रहे हैं और ये सब हो रहा है मीडिया के कैमरों के सामने। कहा जा रहा है कि इस किल्लत की आड़ में पानी माफिया खड़ा हो गया है। पानी वितरण के मौजूदा तंत्र को कतई नाकारा और खोखला साबित करने की चौतरफा तरफ होड़ मची हुई है।
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ठीक उसी तरह जैसी दिल्ली में बिजली के निजीकरण से पहले मची थी। बिजली अब भी जाती है बिजली की किल्लत अब भी है लेकिन अब सरकार, विपक्ष, मीडिया और एनजीओ किसी को भी ये दिखाई नहीं देता। अब इन सबका ध्यान पानी पर है।

दिल्ली में तो क्या पानी की कमी तो है हर जगह है लेकिन सच ये भी है कि इसे कई गुना बढ़ा चढ़ा कर परोसा, दिखाया जा रहा है ताकि अपने हित साधने में इसका इस्तेमाल किया जा सके। जो छोटे बड़े प्रदर्शन और हंगामे किए जा रहे हैं वो दरअसल एक बड़ी साजिश का छोटा हिस्सा भर हैं। ये साजिश है पानी से पैसा बनाने की। पानी को निजी हाथों में सौंपने की। सरकार हो विपक्ष या सरकारी एजेंसियां या फिर मीडिया इसमें सभी इस्तेमाल हो रहे हैं और ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है कि बस अब समय आ गया है कि पानी को निजी हाथों में सौंप दिया जाए और यही अंतिम समाधान भी है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह चुके हैं कि पानी सस्ता है इसलिए लोग इसे बर्बाद कर रहे हैं। विश्व जल सप्ताह के दौरान उन्होंने इसे निजी हाथों में सौंपने तक की वकालत की थी। पीएम ने यहां तक कह दिया कि कानून में परिवर्तन कर इसके सर्वाधिकार को खत्म करना होगा और इसका संचय व वितरण निजी हाथों में देना होगा। उधर वर्ल्ड बैंक और यूएनडीपी कह रहे हैं कि लोग पानी की कीमत देने को तैयार हैं लेकिन सरकारें ले नहीं रहीं।

पानी के पीछे पूंजी का खेल
दरअसल पूरी दुनिया में जहां कहीं भी किसी भी प्रकार के संसाधन हैं उनका दोहन करने के लिए निजी पूंजी झोंकने की होड़ लगी हुई है। चाहत है जल्द से जल्द सब कुछ चूस लिया जाए। इसके लिए एक बड़ा सुनियोजित तंत्र खड़ा किया गया है जिसे पीपीपी यानि पब्लिक प्राइवेट पार्टनर्शिप का नाम दिया गया है। इसके तहत किसी एक समस्या का प्रचार करवाया जाता है, पर्दे के पीछे इसके लिए कॉर्पोरेट फंडिंग होती है। एनजीओ और राजनीतिक दल मीडिया के कैमरों के सामने तरह तरह के प्रदर्शन करते हैं। मीडिया लोगों को बताता है कि आपके जीवन में अमुक समस्या है और दिन ब दिन बड़ी विकराल होती जा रही है। भोली भाली जनता हैरान परेशान सोच में पड़ जाती है और सरकारी तंत्र को कोसने लगती है। बस यही सही समय होता है जब पर्दे के पीछे छिपी निजी पूंजी सामाजिक दाइत्व की दुहाई देते हुए सामने आ जाती है और कहती है कि लाओ ये सब हमें दे दो, हम सब ठीक कर देंगे।

प्यास का कारोबार
हकीकत ये है कि सहूलियत और मजे के लिए शुरू हुए प्यास का कारोबार ने ही दुनिया में पानी की किल्लत पैदा कर दी है। जो पानी लोगों के घरों में पहुंचना चाहिए था उसी पानी को बोतलों में बंद करके कहीं ठंडे के नाम पर तो कहीं साफ पानी के नाम पर लोगों को बेचा जा रहा है। हमारे ही पानी के लिए हमसे ही दाम वसूले जा रहे हैं। प्रकृति ने पानी सिर्फ मनुष्य के लिए नहीं बल्कि पूरी कायनात की प्यास बुझाने के लिए बनाया है। इसके लिए पूरा बंदोबस्त भी किया गया है। पानी के अनंत स्रोत भी बनाए गए, धरती के ऊपर भी और नीचे भी। पानी ऊपर से बरसे और पूरी कायनात की प्यास बुझाता हुआ अंडरग्राउंड हो जाए। ऐसे में सवाल ये उठता है कि जब धरती पर इतना पानी है तो आखिर पानी गया कहां ? दरअसल न तो पानी कहीं चला गया है और न ही पानी की कमी हुई है। ये कमी तो उन नजरों की है जिनकी नजरों का पानी उतर गया है। उन्हें पानी के पीछे पैसा नजर आने लगा है। उनके लालच की प्यास कह रही है कि प्यास का कारोबार की शुरु कर दो।

पानी के निजी हाथों में जाते ही इसकी कीमतें दिन दोगुनी रात चौगनी रफ्तार से बढ़ेंगी। कम्पनियों के हाथ में आते ही पानी तक पहुंच दिन ब दिन मुश्किल हो जाएगी। आम आदमी पानी की एक एक बूंद को तब वास्तव में तरस जाएगा। तब प्यास हिंसक हो उठेगी। कंपनियों की कोशिश होगी कि पानी की हर जरुरत उन्हीं के माध्यम से पूरी हो। इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकती हैं, जैसा कि बोलिविया में पानी के निजीकरण के बाद हुआ, पेयजल स्रोतों पर परमिट तो जरूरी किया ही गया, किसानों को अपनी ही जमीन पर बरसाती पानी इकट्ठा करने पर भी परमिट जरूरी कर दिया गया। इसके बाद विद्रोह हुआ जिसे कुचलने में पूरा सराकरी तंत्र नाकाम रहा। आखिरकार अमरीकी कंपनी बैक्टेल को पीछे हटना पड़ा। भारत में भी जरुरत पानी के निजीकरण की नहीं बल्कि समाजीकरण करने की है ताकि जीवन की ये मूल आवश्यक्ता सर्वसुलभ हो सके न कि शुल्कसुलभ और यह तभी संभव है, जब समाज और सरकार आजादी के साथ साथ जिम्मेदारियों का भी अहसास करे।
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