महात्मा गांधी - क्या कमजोरी हीं अहिंसा है!

गांधी महात्मा या मजबूरी.....क्या कमजोरी हीं अहिंसा है....जी हां आज हम समाज के उस चौराहे पर हम खड़े हैं जहां गांधी के हथियार अहिंसा के समीक्षा की जरूरत आ गई है,,,क्या चारों ओर हो रहे अनशन और यात्रा हीं गांधी के विचारों को सांसे दे रहे हैं या गांधी के सपने अब महज एक पुरानी कब्र बनकर रह गए हैं...जिस कब्र पर अब अपने स्वार्थ के लिए लोग अपनी दुकान चला रहे हैं...दुकानें कई हैं जिनमें परिवार, विचार और आलोचना शामिल है...पिछले कुछ सालों में गांधी को बुरा-भला कहकर प्रसिद्धी पाने वालों की तादाद भी बढ़ी है....इन दुकानों के व्यापार में गांघी के सबसे प्रिय यानि समाज के अंतीम पंक्ति में खड़े बेबस और लाचार लोग अब उम्मीद खो चुके हैं...आज सड़ी हुई राजनीति से हालात ये हो चुके हैं की अपने बच्चों की चंद रोज की भूख मिटाने के लिए एक गरीब आत्मघाती हमलावर बनकर हजारों मासूमों को यतीम करने तक को तैयार है। पीओके में महज 50 हजार रुपए में फिदाईन हमलावर तैयार किए जा रहे हैं। एक के बाद एक घोटालों की खबरें...बढ़ती छीना-झपटी...शिक्षित बेरोजगार...जनता की रक्षक पुलिस पर बलात्कार ओर हत्या के आरोप....क्या यही है गांधी का आजाद मुल्क... महात्मा गांधी ने गुलाम भारत में अंग्रेजी पार्लियामेंट के बारे में अपनी किताब ‘हिंद स्वराज’में जो कुछ भी कहा...वो हमारे आज की संसद पर भी उतना ही सटीक है....गांधी ने कहा था " जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेन्ट तो बांझ और ‘वैश्या’ है ... मैंने उसे बांझ कहा क्योंकि अब तक इस संसद ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया... संसद सदस्‍य दिखावटी और स्वार्थी हैं।
"जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो बांझ और ‘वैश्या’ है" - मोहनदास करमचंद गांधी
यहां सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही संसद कुछ करती है। आज तक एक भी चीज को संसद ने ठीक-ठाक किया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं मिलती... बड़े सवालों की चर्चा जब संसद में चलती है, तब उसके मैंबर पैर फैला कर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते रहते हैं... या फिर इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं... जितना समय और पैसा संसद खर्च करती है उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाये’.....बात कड़वी तो जरूर है पर अंग्रेजों के जाने के 64 साल बाद भी उतनी ही खरी बैठती है। महात्मा गांधी पर चले मुकदमे के रिकार्ड वाली पुस्तक के एक अंश के अनुसार राष्ट्रपिता को उन लेखों के लिए दोषी ठहाराया गया था जिसमें उन्होंने अंग्रेज सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जताई थी और उसे उखाड़ फेंकने की बात कही थी। आज फिर देश उसी दौर से गुजर रहा है जहां स्टेट अपने विरोधियों और अहिंसा से भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ने वालों को कुचला करती है। सरकार ये समझ ले की गांधी अब नहीं रहे लेकिन गंधी की अहिंसक विचारधारा अब पूरे भारत में दोबारा जाग रही है...और आने वाला कल भ्रष्टतंत्र पर स्व्च्छ तंत्र का होगा....लेकिन जरूरत है गांधी के नाम की दुकान चलानेवालों को पहचान कर उनसे बचने की और अपने सच और अहिंसा की शक्ति को पहचानने की।
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