मोदी ने फिर तोड़ा राजधर्म, पकड़ी वोटधर्म की राह

मोदी पर राजधर्म नहीं निभाने के आरोप तो सालों से लगते रहे हैं एक बार फिर उनके वोट धर्म और महत्वाकांक्षा राजधर्म पर भारी पड़ गया। उपवास पर बैठे मोदी ने इमाम की टोपी पहनने से इनकार कर कई सवालों को जन्म दे दिया। क्या मोदी पार्टी की सोच और अपनी इमेज को बदलने की मुहिम के बीच फंस कर रह गए... । क्या भारत के भावी प्रधानमंत्री की टोपी पहनने वाले नेता ने अल्पसंख्यकों के हितैशी होने का मौका गंवाया दिया। मोदी का टोपी पहनने से इंकार करना क्या महज इत्तेफाक है या इसके पीछे है कोई डर....। बीजेपी का इतिहास बताता है कि पार्टी में विचारधारा बड़ी हा ना कि व्यक्तिवाद..... कई बड़े नेता पार्टी लाइन से अलग जाकर अपना राजनीतिक वनवास झेल चुके हैं।

पाकिस्तान में जिन्ना के मजार पर दिए गए बयान ने लालकृष्ण आडवाणी को राजनीतिक वनवास दे डाला था...आडवाणी संघ के विचारों के खिलाफ क्या गए, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी। आडवाणी का जिन्ना को सेकुलर बताना भारी पड़ गया।
लेकिन मोदी ने खेला सुरक्षित दांव!
इसके बाद ‘जिन्ना इंडिया-पार्टिशन इंडिपेडेंस’ ने कद्दावर नेता जसवंत सिंह की जड़ें हिला कर रख दीं... जसवंत सिंह भी संघ के विचारों की सीमारेखा से बाहर चले गए...और उन्हें भी इसकी कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन मोदी ने वो गलती नहीं दोहराई...। शायद मोदी को पता था कि उनका ये कदम भगवा ब्रिगेड को नागवार गुजर सकता है। भले ही मोदी ने टोपी से परहेज कर संघवादियों को खुश कर दिया हो, लेकिन टोपी नहीं पहनने के एवज में मोदी को विपक्ष, मीडिया और जनता के सवालों का जवाब देना होगा...। कहते हैं राजनीति में मुर्दे गाड़े नहीं जाते...आज 10 साल बाद भी मोदी गुजरात में हुए दंगे पर जवाब दे रहे हैं...देखना ये होगा कि इस टोपी का जिन्न कब तक मोदी के साथ रहता
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