गरीबों के घावों पर आंकड़ों का तेजाब

महंगाई की आग में झुलस रहे आम आदमी के घावों पर सरकार ने इस बार नमक नहीं तेजाब छिड़क दिया है। आम आदमी की परेशानी से खुद को चिंचत बताने वाली सरकार ने एक बार फिर बेशर्मी की हदें तोड़ दी हैं। सरकार गरीब को और ज्यादा गरीब बनाने की तैयारी कर रही है। टैक्स का बोझ बढ़ाया जा रहा है... चीजों के कीमतें में इजाफा किया जा रहा है..... उस पर लोगों को मिल रहे सरकारी योजनाओं के लाभ भी छीनने के लिए सरकार तैयारी कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामें में सरकार ने कहा है कि शहरी इलाकों में रहने वाला कोई कोई आदमी अगर 32 रुपए रोज खर्च करता है तो उसे सरकारी सुविधाओं या सब्सिडी की जरूरत नहीं है। सरकार ने कहा है कि शहरी इलाकों में हर महीने 965 रुपए और ग्रामीण इलाकों में 781 रुपए से ज्यादा खर्च करने वालों को सरकारी सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए।
दाल - 1.20 रुपए
चावल, आटा – 5.50 रुपए
दूध – 2.33 रुपए
सब्जियां – 1.95 रुपए
खाने का तेल – 1.35 रुपए
फल - 44 पैसे
चीनी - 70 पैसे
नमक और मसाले - 78 पैसे
LPG/केरोसिन - 3.75 रुपए
योजना आयोग का कहना है कि एक आदमी एक दिन में एक रुपए 20 पैसे खर्च करके खाने की थाली में दाल का इंतजाम कर सकता है। इसके अलावा चावल और आटे के लिए हर रोज पांच रुपए 50 पैसे और दूध के लिए दो रुपए 33 पैसे का खर्च करना काफी है। हरी-सब्जियों के लिए एक रुपए 95 पैसे, खाने के तेल के लिए एक रुपए 55 पैसे, फलों के लिए 44 पैसे, चीनी के लिए 70 पैसे, नमक-मसालों के लिए 78 पैसे और गैस सिलेंडर या केरोसिन के लिए हर दिन 3.75 पैसे काफी हैं। सरकार ने पढ़ाई लिखाई और कपड़ो का भी हिसाब सुप्रीम कोर्ट को दिया है। योजना आयोग ने कहा है कि एक महीने की स्कूल फीस और स्टेशनरी पर 99 पैसे बहुत हैं... 61 रुपए 30 पैसे में महीने भर कपड़े पहने जा सकते हैं। जूते-चप्पल के लिए नौ रुपए 60 पैसे और कॉस्मेटिक के लिए महीने भर में 28 रुपए 80 पैसे काफी हैं। आम आदमी की परेशानी को लेकर कई बार चिंता जता चुके प्रधानमंत्री मनमोहन ने खुद इस हिसाब किताब पर मुहर भी लगाई है। इससे पहले 2004 में सरकार ने गरीबी रेखा को महज 20 रुपए प्रतिदिन तक सीमित कर दिया था... और बेतहाशा महंगाई बढ़ जाने के बाद गरीब के एकाउंट में उसके हर रोज के खर्च में 12 रुपए का अहसान और जोड़ दिया है। खर्च का ये हिसाब दहाई का आंकड़ा छू रही महंगाई को ध्यान में रखकर तैयार किए गया है। 2004 से अब तक सांसदों और विधायकों ने महंगाई की दुहाई देकर अपना वेतन कई गुना बढ़ा लिया... लेकिन गरीब के हिस्से में आई तो बस कमर तोड़ महंगाई... ताजा हलफनामे से तो साफ है कि सरकार की मंशा में कहीं खोट है। क्या सरकार सब्सिडी खत्म करने के नाम पर गरीब के मुंह का निवाला भी छीन लेना चाहती है.... क्या सरकार बस ये नहीं चाहती कि लोग बद्तर से बदतर हालात में बस जिंदा रहें ताकि उनके वोट चुनाव जीतने में काम आ सकें।


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