सोनिया गांधी की सर्जरी से भी बड़ी मुसीबत

सर्जरी के बाद अमेरिका से वापस आ रही सोनिया गांधी को कई मुसीबतों का सामना एक साथ करना पड़ेगा... सोनिया के घर लौटने की खबर से कांग्रेस भले राहत महसूस कर रही हो लेकिन डॉक्टर अभी सोनिया को कामकाज से दूर रखने की पूरी कोशिश करेंगे।
एक महीने की सोनिया की गैरमौजूदगी में सरकार और पार्टी में भारी भ्रम और हताशा में उलझ गई थी। अन्ना हजारे के आंदोलन ने सरकार और पार्टी को ऐसी निराशा में फंसा दिया कि उससे निकलने की कोशिश में वह और गलतियों पर गलतियां करने लगी।

अभी तक का नरम रवैया
सोनिया गांधी का राजनीतिक तरीका इंदिरा गांधी की तरह गलती करने वालों को कड़ी सजा देने का नहीं है। सोनिया अपने सहयोगियों पर विश्वास करती हैं और तब तक भृकुटी टेड़ी नहीं करती जब तक कि पानी सिर तक नहीं आ जाए। अभी पार्टी और सरकार में नरम रवैया अपनाने लोग अन्ना पर कड़े हमले करने वालों के खिलाफ किसी कठोर कार्रवाई की उम्मीद बांधे बैठे हैं। लेकिन सोनिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी, एंटोनी और अहमद पटेल की अपनी पुरानी विश्वसनीय टीम से सलाह मशवरा करके ही आगे का रास्ता तय करेंगी।

टीम अन्ना के और तल्ख होने का इंतजार
टीम अना के लोग जिस तरह एरोगेन्ट हो रहे हैं, उससे सरकार को अपने आप फायदा हो रहा है। विपक्षी राजनीतिक दल कांग्रेस को सबक सिखाने का मजा लेने के बावजूद इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि अन्ना के लोग पूरी राजनीतिक व्यवस्था का मजाक उड़ाने और उन्हें नकारा साबित करने पर तुले हुए हैं। सोनिया का संतुलन का रास्ता भारत के मध्यमार्गी मिजाज से खूब मेल खाता है। चुनावों में अभी ढाई साल है। पार्टी और सरकार को वापस देश का राजनीतिक अजेंडा अपने हाथ में लेने के लिए यह कम समय नहीं है।

अन्ना से रामदेव की तरह निपटने की गलती
लोकपाल बिल की संयुक्त मसौदा समिति के कामयाब नहीं होने से बौखलाई सरकार ने पहले अन्ना से बात नहीं करने का अडि़यल रवैया दिखाया। फिर अन्ना के समर्थन में बने माहौल का गलत आकलन करके उन्हें गिरफ्तार किया। फिर रिहा किया और आखिर में संसद में उनकी मांगें मानने का प्रस्ताव पास किया। इससे किसी के समझ में पार्टी लाइन नहीं आ पाई।

कुछ मंत्री इसे कानूनी समस्या समझ बैठे
अन्ना का आन्दोलन कोई लोकपाल बिल की वजह से सफल नहीं हुआ। दरअसल शहरी मध्यमवर्ग के अंदर लंबे समय से महंगाई, भ्रष्टाचार, शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे खदबदा रहे थे। विपक्षी पार्टियां इन्हें ठीक से उठा नहीं पा रही थीं। यूपीए 2 की सरकार की भी यूपीए वन की तरह राजनीतिक अजेंडे पर पकड़ नहीं थी। नतीजे में जो राजनीतिक शून्य पैदा हुआ उससे अन्ना के लिए साजगार माहौल बनता चला गया। कुछ मंत्रियों ने इसे कानूनी समस्या की तरह पेश करके मामले को और उलझा दिया। विपक्ष और अन्ना ने चिदंबरम और कपिल सिब्बल को निशाना बनाना शुरू कर दिया। सरकार के कभी गरम और कभी नरम रुख ने राजनीतिक अनिश्चितता की स्थिति बना दी।
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