माया का मायाजाल और तीन जिलों का सच

पूरे भारत की राजनीति का अहम हिस्सा उत्तर प्रदेश...कहते हैं राजनीति में बेवजह कुछ भी नहीं होता...तो मायावती के नए जिलों का क्या है सच…? विधानसभा चुनाव जैसे जैसे नजदीक आ रहा है... उत्तर प्रदेश की राजनीति में उफान आता जा रहा है... शह और मात का खेल शुरू हो चुका है... चुनावी शतरंज की बिसात पर रोज नई नई चालें चली जा रही हैं। रोज कुछ ऐसा हो रहा है जो बेहद दिलचस्प...दोहरे चरित्र वाला है... जिलों के बनने के पीछे की सोच विकास की चिंता है या फिर राजनीति का गणित...। ऐसे में चुनाव से ऐन पहले तीन नए जिलों के एलान से माया की मंशा पर सवाल उठते हैं।
माया की माया
तीन नए जिलों का एलान
नए जिले जरूरत या राजनीति ?
क्या नए जिलों से होगा विकास?
विकास की चिंता या
चुनावी गणित
प्रबुद्धनगर यूपी का नया जिला
बना पंचशील नगर
संभल हुआ भीमनगर

प्रशासन में सुविधा और आवाम की तरक्की
या नये जिलों का जाल है राजनीतिक नश्तर
आवाम के लिए तस्वीर जितनी साफ दिख रही है सच्चाई उससे परे है। नए जिले के गठन के में एक सोची समझी रणनीति है...इसके पीछे है मायावती का वादा। 2007 के विधानसभा चुनावों में मायावती ने शामली को जिला बनाने की घोषणा की थी। माया का ये कदम जाट बहुल इस क्षेत्र में पूरी तरह से पकड़ मजबूत करने की रणनीति का एक अहम हिस्सा है... इससे पहले भी चुनावी दांव चलते हुए मायावती ने अमेठी को छत्रपतिशाहूजी महाराज नगर और एटा को कांशीराम नगर नाम से जिला बनाने का एलान किया था। लेकिन क्या जिला बनाने से ही विकास हो जाएगा। इससे कर्ज में डूबा ये राज्य और बदतर हालात में पहुंच जाएगा। नए जिले के गठन से सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है...सिर्फ हापुड़ को जिला बनाने पर सरकार तुरंत 12 सौ करोड़ की रकम खर्च करेगी। इनमें जेल और पुलिस लाइन पर छह सौ करोड़ रुपये खर्च होंगे। नए जिले की घोषणा के साथ सरकार को वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा... जिला मुख्यालय, विकास भवन और पुलिस लाइन के साथ दूसरे सरकारी कार्यालय और आवासों का निर्माण कराना होगा...मायावती के नए जिले बनाने का मकसद सिर्फ विकास की चिंता भर नहीं है। इसके पीछे वोट बैंक की सियासत भी है। ऐसी सियासत जो उत्तर प्रदेश की गरीब आवाम को और ज्यादा गरीब बनाएगी ।
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