सोनिया गांधी और कांग्रेस को चित कर देंगे मनमोहन

सोनिया गांधी ने जब मनमोहन सिंह को कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था तो राजनीतिक तर्क यह दिया गया था कि मनमोहन सिंह राजनीतिक रूप से कमजोर व्यक्ति हैं इसीलिए सोनिया गांधी की पहली पसंद हैं. सात साल के रिकार्ड कार्यकाल में उन्होंने यह बात सोलह आने सही साबित कर दी है कि वे कमजोर प्रधानमंत्री हैं. लेकिन मनमोहन के पक्ष में सबसे बड़ी बात यही है कि उनकी कमजोर छवि ने ही अब तक उन्हें बचाये रखा है.

सोनिया की नजर में वे आसानी से हर बात मान लेने वाले सिपहसालार थे, जिनसे हर उल्टा सीधा काम कराया जा सकता था और जरूरत पङने पर बगैर किसी परेशानी के हटाया जा सकता था. लिहाजा उन्होंने धैर्य रखना बेहतर समझा, राहुल को भारतीय राजनीति की आंच में पकने का मौका दिया. मगर अब वे बेसब्री से इंतजार कर रही हैं कि मनमोहन चुपचाप अपनी कुरसी राहुल बाबा को ऑफर कर दें, मगर मनमोहन दांव पर दांव खेल रहे हैं. राहुल की राह में कांटे बो रहे हैं और खाइयां खुदवा रहे हैं. हालांकि कसूरवार अकेले मनमोहन नहीं हैं. वे सचमुच कुछ हद तक इमानदार हैं और पैसे से अधिक पद की महत्वाकांक्षा रखते हैं. सच तो यह है कि इन दिनों उनके दिल में शूल चुभा है और आंखों में खून भरा है.

रबर स्टैंप की कुंठाएं
उन्हें जितनी बार कमजोर या रिमोट से चलने वाला खिलौना कहा जाता है, वे उतनी दफा कमस खाते होंगे कि उन्हें कांग्रेस की मलिका से और इस पूरी पार्टी से अपने तमाम अपमानों का बदला लेना है. जिसने कभी उनकी काबिलियत को तरजीह नहीं दी, हमेशा उन्हें मोहरा समझा. उनसे भ्रष्टाचार करवाया और लोगों के आक्रोश को झेलने के लिए आगे खड़ा कर दिया. उन्हें इस बात का भी गुस्सा है कि कोई दिग्विजय कभी भी कह देता है कि अब राहुल पीएम बनने के लिए तैयार हैं. और तो और कांग्रेस की पूरी की पूरी लॉबी बेशर्मी के साथ इंतजार कर रही है कि इसी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मनमोहन निबट जायें और राहुल की ताजपोशी हो जाये, मगर जिस तरह अन्ना के आंदोलन के बावजूद सरकार बची रह गयी, वे हाथ मल रहे होंगे.

दरअसल सोनिया ने मनमोहन को कुरसी सौंपी तो उन्हें लगा कि सोनिया ने उन पर बहुत बड़ा एहसान किया है. जीवन के किसी दौर में उन्होंने यह सपना नहीं देखा होगा कि वे देश के प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं. ब्यूरोक्रेट मनमोहन ने कुछ समय तक खुद को कांग्रेस की राजनीति के अनुरूप ढालने की जबरदस्त कोशिशें कीं. हर सार्वजनिक मंच पर सोनिया के कुनबे के आगे शीश नबाकर, हर एक फैसला उनसे पूछ कर, चुपचाप रह कर, प्रधानमंत्री होने के प्रभाव को चेहरे पर लाये बगैर... मगर धीरे-धीरे उन्हें समझ आने लगा कि सोनिया ने उनके साथ कोई एहसान नहीं किया है. वे उसे मोहरा बनाकर अपने बेटे और बेटी दोनों का भविष्य संवारने में जुटी हैं. सोनिया ने प्रियंका के लिए पैसों की बारिश कर दी और राहुल को पीएम पद के लिए तैयार कराने में जुट गयी.

यूपीए-1 जब खत्म हुआ तो यह योजना बनी कि अब राहुल को आगे किया जाये. मगर परमाणु बिल पास कराकर मनमोहन तब तक सिंह इज किंग की छवि हासिल कर चुके थे और इतना आसान नहीं था कि उनकी जगह राहुल को प्लेस कर दिया जाये. लिहाजा यूपीए-२ में भी बुझे मन से ही मनमोहन को ही कमान सौंप दी गयी, वह भी इस योजना के साथ कि अब किसी न किसी बहाने से मनमोहन को बीच में ही उतार लेना है. क्योंकि राहुल के लिए तीसरे टर्म का इंतजार करना बेवकूफा होगी. वैसे भी तीसरी बार सत्ता हासिल करना इतना आसान नहीं होता है. लिहाजा मनमोहन को नाकाम साबित करने का खेल शुरू हो गया. मगर मनमोहन ने इन हमलों को सफलता पूवर्क नाकाम करना शुरू कर दिया.

हम आज जिन घोटालों की बातें करते हैं उनमें से अधिकांश घपलों के फायदे में प्रियंका पति राबर्ट की किसी न किसी रूप
अब तक नरसिंहा राव की मुद्रा में रहने वाले मनमोहन चुनाव से पहले अचानक बीपी सिंह की मुद्रा अख्तियार कर लेंगे और सोनिया के कुनबा पर प्रहार शुरू कर देंगे. कांग्रेस छोङ देंगे. लिहाजा सोनिया का कुनबा एक बार फिर भ्रष्टाचार के आरोप में घिर कर जनमानस के बीच छवि गंवा बैठेगा. टीम मनमोहन ने गुपचुप तरीके से अपनी टीम बनानी भी शुरू कर दी है. नीतीश, नायडू और दूसरे कई दिग्गज इस टीम में हो सकते हैं. इंतजार कीजिये, दिलचस्प मोङ लेगी भारतीय राजनीति.
में हिस्सेदारी रही है. मार्च, २०११ में बिजनेस टाइम्स ने खबर छापी कि राबर्ट अरबपति बनने वाले सबसे तेज भारतीय हैं. टूजी स्पेक्ट्रम बंदरबांट में सबसे अधिक फायदा कमाने वाली मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी यूनिटेक में उनका २० फीसदी शेयर है. कॉमनवेल्थ का सबसे अधिक ठेका हङपने वाली कंपनी डीएलएफ, जो आईपीएल की भी प्रायोजक है ने राबर्ट की कंपनियों को मामूली शर्तों पर बड़ी राशि बतौर लोन दी है. इसका अर्थ यह समझा जाना चाहिए कि यह राशि बतौर रिश्वत दी गयी है और इसकी वापसी की अपेक्षा कंपनी नहीं रखती होगी. यानि देश के सर्वाधिक चर्चित दो घोटालों से राबर्ट का नाम जुड़ा है. इसका यह अर्थ नहीं कि इन घोटालों में राबर्ट की हिस्सेदारी है बल्कि यह कि प्रियंका के परिवार को लाभ पहुंचाने के लिए ही इन दोनों घोटालों की परिकल्पना की गयी होगी.

डुएल थ्योरी
अब यहां दो तरह को थ्योरीज काम करती हैं. पहली कहती हैं कि देश के बड़े घोटालों से सोनिया परिवार के ताल्लुकात हैं, देश में फैले भ्रष्टाचार की जङ में यही परिवार है. जिसकी घोषणा सुब्रमनियम स्वामी बार-बार करते हैं और जो मनमोहन कंपनी को सूट भी करता है. मगर एक थ्योरी यह भी है कि जानबूझकर इन्हीं दो घोटालों को सामने लाया गया ताकि सोनिया परिवार की प्रतिष्ठा इतनी धूमिल कर दी जाये कि फिर उन्हें कभी सरकार बनाने का सपना न आये. एक बड़ी मीडिया कंपनी भी इस कांस्पिरेसी में टीम मनमोहन का खुलकर साथ दे रही है, चाहे कॉमनवेल्थ घोटाले की बात हो या टूजी बंदरबांट की. गाहे बगाहे सोनिया परिवार पर आक्षेप करने में भी यह पीछे नहीं रहती. चाहे राहुल को युवराज का तगमा देना हो, या वाड्रा के अचानक अरबपति बन जाने की खबर.

माहिर मनमोहन
दरअसल लाख पढ़ने के बावजूद राहुल राजनीति का एबीसीडी भी नहीं समझ पाये मगर मनमोहन एकलव्य की तरह देख-देख कर ही माहिर खिलाडी बन गये. उन्होंने न सिर्फ सोनिया के कुनबे बल्कि कांग्रेस पार्टी की जङ में मट्ठा डालने का काम शुरू कर दिया. उन्हें समझ आ चुका है कि लाख चाहें तीसरी बार कांग्रेस उन्हें पीएम नहीं बनायेगा. मगर सिंह को किंग बनने का चस्का लग गया है. संयोगवश उन्हें तीसरी बार पीएम बनने का फार्मूला भी मिल गया है.

क्या है फार्मूला
अब तक नरसिंहा राव की मुद्रा में रहने वाले मनमोहन अचानक चुनाव से पहले बीपी सिंह की मुद्रा अख्तियार कर लेंगे और सोनिया के कुनबा पर प्रहार शुरू कर देंगे. कांग्रेस छोङ देंगे. लिहाजा सोनिया का कुनबा एक बार फिर भ्रष्टाचार के आरोप में घिर कर जनमानस के बीच अपनी बेहतर छवि गंवा बैठेगा. टीम मनमोहन ने गुपचुप तरीके से अपनी टीम बनानी भी शुरू कर दी है. नीतीश, नायडू और दूसरे कई दिग्गज इस टीम में हो सकते हैं. इंतजार कीजिये, दिलचस्प मोङ लेगी भारतीय राजनीति.

(सभार विस्फोट)
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