सरकार गरीबों की जेब में भी तलाश रही है मुनाफा

सरकार कारोबारी बन गई है… एक ऐसा कारोबारी जो हर चीज में मुनाफा तलाश रहा है। उसे लोगों के भले बुरे की नहीं अपने फायदे की फिक्र है। वो हर रोज चीजों के दाम बढ़ाए जा रहे हैं और पीएम और वित्त मंत्री कहते हैं कि इसमें वो कर ही क्या सकते है... वो कहते हैं उनके पास कोई जादू की छड़ी थोड़े है... जो उसे घुमाकर वो महंगाई को कम कर देंगे। इधर तेल कंपनियों नें पेट्रोल के दाम 3.14 रूपये बढ़ाये तो उधर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया आम आदमी को राहत देने के बजाय सभी तरह के लोन को महंगा करने की व्यवस्था कर दी ऊपर से तुर्रा यह कि यह सब महंगाई को काबू करने के लिए किया जा रहा है. RBI ने रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में 25 बेसिस पाइन्ट्स की बढोत्तरी कर दी। इस समय रेपो रेट 8.25 और रिवर्स रेपो रेट 7.25 पाइन्ट्स हो चुका है।

महंगाई बढ़ाने का जादूई फॉर्मूला
जादू की छड़ी तो नहीं लेकिन एक ब्याज दरें बढ़ाने का जादूई फॉर्मूला जरूर सरकार ने इजाद कर लिया है। जब-जब महंगाई बढती है तो आरबीआई अपने जादुई तरीके को अपनाते हुए रेपो  रेट और रिवर्स रोपो रेट को बढा देती है। बीते 18 महीने में रिजर्व बैंक ने 12 बार बैंक दरों में इजाफा किया है। इसक असर तमाम तरह के लोन ( होम लोन, कार लोन, गूड्स करियर लोन, बिजनेस लोन) पर पड़ना तय है। आज नहीं तो कल लोगों को लोन के लिए ज्यादा किस्त चुकानी पड़ेगी। साफ है कि कारण चाहे जो हो अगर व्याज के रूप में बैंक को ज्यादा पैसा अदा करना पड़ेगा तो महंगाई रुकेगी कैसे?

औद्योगिक घरानों को फायादा पहुंचाने की खातिर
महंगाई का चार्ट बता रहा है कि अगस्त के महीने में महंगाई दर 9.78 फीसदी हो चुकी है। ये 12 महीने के उच्चतम स्तर पर है। खाने पीने की चीजों की महंगाई दर 3 सितंबर को खत्म हुए सप्ताह में 9.47 फीसदी पर रही। सरकार द्वारा लगातार महंगाई बढ़ाना पूरी तरह से जनविरोधी है। इसी साल जनवरी से अब तक पेट्रोल 10 रुपए महंगा किया जा चुका है। सालों से हर बार सरकार बहाना बना देती है कि पेट्रोल कंपनियों को घाटा हो रहा है। अगर वास्तव में ऐसा होता तो अब तक तो सभी तेल कंपनियों का दीवाला निकल चुका होता।
महंगाई बढ़ाना आपकी मजबूरी है, भ्रष्टाचार में आपके मंत्री आकंठ डूबे हुए है, आतंकवाद से निपटना आपके बस की बात नहीं तो आप सत्ता से क्यों चिपके है।
तेल कंपनियों के खाते मुनाफे से लबालब हुए जा रहे हैं और दीवाला निकल रहे है आम आदमी का। तेल के इस खेल के पीछे बड़े औद्योगिक घरानों का हाथ साफ दिखाई दे रहा है। तेल के दाम बढ़ाने से सबसे ज्यादा फायदा उन्हीं को है। इन्हें अपने पेट्रोल पम्प इसलिए बंद करने पड़े थे क्योंकि कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां के घाटे की भरपाई सरकारी बेलआउट पैकेज से हो जाती थी...और निजी कंपनी को सब्सिड़ी की रकम अपने जेब से देनी पड़ती थी। सरकार पेट्रोल की कीमतें लगातार बढ़ाती जा रही है ताकि निजी कंपनियां अपने बंद पड़े पेट्रोल पंप दोबारा चालू कर सकें।

इस तरह महंगाई कभी कम नहीं होगी
सरकार चाहे ब्याज दरों कि कितनी भी बढ़ोत्तरी कर लेकिन महंगाई कम नहीं होगी क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निगमों को सरकार ने दाल चावल आटा तेल और राशन का तमाम सामान बेचने का अधिकार जो दे दिया है। ये बात साफ साफ समझ में आती है कि अनाज, दालें, खाने के तेल, फल सड़क पर लगे ठेले के बराबर मुनाफे पर बेचे जाएंगे तो शापिंग माल बनाने में किये गए पूंजी निवेश का रिटर्न या माल के कर्मचारियों की तनख्वाह और रखरखाव तो दूर माल में लगे एसी का बिजली का बिल नहीं भरा जा सकता। जमाखोरी के खिलाफ तमाम आढ़तियों के गोदामों पर छापेमारी की गई लेकिन क्या किसी रिटेल चेन के कारोबार में लगी बहुराष्ट्रीय कंपनी के वेयरहाउसों पर अधिकारियों ने छापेमारी की गई?

निर्यातकों की खातिर रुपए का बंटाधार
मंदी की मार से अमेरिका का दम फूल रहा है... यूएसए के बांडों की साख पर बट्टा लगता जा रहा है फिर भी क्या कारण है कि डालर के सामने रूपया लगातार कमजोर हो रहा है। आखिर इस समय रूपये का अवमूल्यन क्यों किया जा रहा है? क्या अवमूल्यन पूंजीपति निर्यातकों को फायादा पहुंचे के लिए नहीं किया जा रहा है?

महंगाई से जनता की तकलीफें बढ़ती जा रही हैं और सरकार कह रही है कि हमें खेद तो है लेकिन चीजों के दाम बढ़ाना हमारी मजबूरी है। महंगाई बढ़ रही है... लोगों का दीवाला निकल रहा है और आपके मंत्रियों की संपत्ति में हजार-हजार फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है ! ये क्या गोलमाल है भाई? एक तरफ सरकार खर्चों और घाटे का रोना रो रही है। छठे वेतन आयोग लागू करने के भार से उबरने से पहले ही 1 जुलाई 2011 से सरकार ने कर्मचारियों का डीए 7 फीसदी बढा दिया है। इससे सरकारी खजाने पर हर साल 7 लाख 22 हजार करोड रूपये का बोझ बढ़ेगा। लगता है सरकार का फॉर्मूला है कि महंगाई बढ़ाओ, आम जनता को लूटो, सरकारी खजाने भरो, और फिर उसे सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, पार्षदों, विधायकों, सांसदों, और मंत्रियों में बंदरबाँट करो।

आम आदमी के लिए नहीं है विकास
सरकार की नीतियां मुनाफा कमाने बनाने तक ही सिमट गई हैं। “कल्याणकारी स्टेट” अब “मुनाफाखोर कारोबारी” में तब्दील हो रही है। साफ है कि देश को लोगों के वोटों से बनी सरकार नहीं बल्कि कुछ चुनिन्दा उद्योगपति और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी मनमर्जी के मुताबिक हांक रही है। महंगाई बढ़ाकर लोगों की जेब काटी जा रही है और आदिवासीयों के हिस्से के जल, जंगल और जमीन लूटे जा रहे हैं। मनमोहन सिंह तेज टिकाऊ और समग्र विकास का जुमला फेंका रहे हैं... क्या करे आम आदमी इसका? दरअसल ये तो सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, पार्षदों, विधायकों, सांसदों, और मंत्रियों और पूंजीपतियों के लिए है आम आदमी के लिए नहीं।
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