स्पर्म देकर अपने ही पोते का पिता बन गया

क्या आप अपने ही बेटे के भाई हो सकते हैं
क्या आप अपने पोते के पिता हो सकते हैं... यकीनन आप ये पढ़कर चौंक गए होंगे... और यकीनन ऐसा कहलाना नहीं चाहेंगे...लेकिन पेशे से गाइनकॉलजिस्ट डॉक्टर शैलेश पटेल अपने ही पोते के बायलॉजिकल पिता हैं और ये फैसला पूरे परिवार ने मिल बैठकर ही लिया है।

दरअसल, यूएस में रहने वाले शैलेश के सॉफ्टवेयर इंजिनियर बेटे राहुल को अज़ूएसपर्मिया नामक बीमारी है, जिसकी वजह से राहुल के शरीर में स्पर्म बनते ही नहीं हैं। ऐसे में राहुल के परिवार ने आपसी सहमति से यह फैसला लिया कि शैलेश स्पर्म्स डोनेट करेंगे।

डॉक्टर्स का कहना है कि डोनेट किए हुए स्पर्म्स का इस्तेमाल IVF तकनीक के जरिए किया जाता है।
अपने ही पोते के पिता
अपने बेटे का भाई
इस बारे में शैलेश पटेल का कहना है, ' किसी अजनबी के स्पर्म्स का इस्तेमाल कर उसके लक्षण लेने की बजाय हमने फैसला लिया कि परिवार से ही स्पर्म्स लिए जाएं ताकि बच्चे को पारिवारिक जीन्स ही मिलें। इससे बच्चे में परिवार के लोगों जैसे ही रंग, बुद्धि और आंखें होने में मदद मिलती है।

परिवार की वंश-विरासत को आगे बढ़ाने के लिए न सिर्फ ससुर बल्कि कई बार जीजा या साला तक स्पर्म डोनेट करते हैं। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब पिता ने बेटे को स्पर्म दिए हों। कई लोग समाज के तानों से बचने के लिए यह काम गुपचुप तरीके से करते हैं, जबकि कई मामलों में पूरे परिवार में यह फैसला खुलेआम बातचीत करके लिया जा रहा है।

इस तरह की डोनेशन्स का जिक्र असिस्टेड रीप्रॉडक्ट्वि टेक्नॉलजी (ART) बिल में भी है। यह बिल पार्लियामेंट में पेंडिंग है। इसकी ड्राफ्ट कमिटी के मेंबर डॉक्टर मनीष बैंकर ने बताया कि यदि यह बिल पास हो जाता है तो घर-परिवार और परिचित से स्पर्म लेकर बच्चे पैदा करने पर आरोपी को तीन साल तक की कैद हो सकती है। किसी जानकार से स्पर्म लेना तब अवैध हो जाएगा।

आईवीएफ एक्सपर्ट फाल्गुनी बाविशी ने बताया कि बेटे में स्पर्म संबंधी समस्या का पता चलने पर कई बार पिता उनसे उनके स्पर्म्स लेकर बच्चा पैदा करने की गुजारिश करते हैं। ये पिता चाहते हैं कि इनके बेटों और बहुओं को इस बारे में कुछ खबर न लगे। उन्होने बताया, 'हम ऐसे मामलों पर गौर ही नहीं करते। हमारी पॉलिसी है कि दंपती को पता होना चाहिए कि स्पर्म किसके हैं, यदि दानकर्ता कोई जानकार है तो।'

सरोगेसी एक्सपर्ट डॉक्टर नैना पटेल का कहना है, 'न सिर्फ चेहरे- मोहरे, बल्कि परिवार वाले जिद करते हैं कि बुद्धि के मामले में भी अगली जेनरेशन उन्हीं की वंश विरासत को आगे बढ़ाए। ऐसे ही एक मामले में एक वरिष्ठ शिक्षाविद किसी अजनबी डोनर से स्पर्म नहीं चाहते थे क्योंकि वह चाहते थे कि बच्चे में पढ़ाई-लिखाई को लेकर पारिवारिक जीन्स ही आएं।'

अमेडिकल लैब के डॉक्टर भवानी शाह का कहना है कि साला,जीजा और ससुर करीब 20 %मामलों में ऐसे डोनेशन कर रहे हैं। ये मामले गरीबों और बहुत ज्यादा अमीरों में देखने को मिलते हैं। मिडिल क्लास में ऐसे मामले कम हैं।
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