आखिर सरकार कर ही ली मनमानी

नई दिल्ली, संसद में अन्ना की शर्तों पर प्रस्ताव सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हो गया। प्रणव मुखर्जी ने इसे लोकसभा में पेश किया और सांसदों ने मेजें थपथपाकर प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया। उसे स्थायी समिति को भेज दिया। राज्यसभा में इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया गया। इसके बाद लोकसभा सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी गई।

लोकसभा में लाए गए प्रस्ताव पर लगभग 9 घंटे तक चली बहस के बाद सदन के नेता व केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा, 'मैं समझता हूं कि सदन की भावना यह है कि वह सैद्धांतिक तौर पर राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति, लोकपाल के दायरे में सभी सरकारी कर्मचारियों को लाने और नागरिक चार्टर बनाने पर सहमत है।'
इसके बाद सभी सदस्यों ने मेज थपथपाकर इसका समर्थन किया। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने सदन की कार्यवाही सोमवार 11 बजे तक स्थगित कर दी। इसके बाद राज्यसभा में भी इस प्रस्ताव को पास कर दिया गया।

टीम अन्ना खुश
प्रस्ताव पास होने पर टीम अन्ना ने खुशी जताई है। टीम अन्ना की सदस्य किरन बेदी ने ट्विटर पर इसका स्वागत किया। अन्ना अब अपना अनशन तोड़ देंगे। मगर, सरकार ने वादा किया था कि इस प्रस्ताव पर ध्वनिमत से फैसला होगा। यह वादा सरकार ने तोड़ दिया और मेजें थपथपाए जाने को ही ध्वनिमत मान लिया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक मेजें थपथपाए जाने को ध्वनिमत माना जा सकता है।

' आंशिक धोखाधड़ी '
सरकार ने प्रस्ताव पर वोटिंग न कराकर टीम अन्ना के साथ एक बार फिर छल किया। टीम अन्ना इन तीन मुद्दों पर वोटिंग चाहती थी ताकि यह पता चले कि राज्यों में लोकायुक्त बनाने, सिटिजन चार्टर तैयार करने और न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को भी जांच के दायरे में लाने पर किस पार्टी का क्या स्टैंड है। बाद में टीम अन्ना इस पर तैयार हो गई कि प्रस्ताव इंडिविजुएल वोटिंग के बजाय ध्वनिमत से वोटिंग हो। लेकिन ऐन वक्त पर जब सारा देश बहस की समाप्ति पर स्पीकर मीरा कुमार द्वारा ध्वनिमत कराने का इंतजार कर रहा था, तब स्पीकर ने सदन को सोमवार तक स्थगित करने का ऐलान कर दिया।

आज के प्रस्ताव पर सरकार द्वारा वोटिंग न कराने के पीछे कारण यह बताया जाता है कि सदन में इन तीन मुद्दों पर सर्वसम्मति नहीं थी - लालू प्रसाद जैसे नेताओं ने अपने भाषण में इसका खुलासा भी किया - और सरकार नहीं चाहती थी कि वोटिंग के मार्फत ये मतभेद दिखें। संभवतः कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां नहीं चाहती थीं कि वोटिंग के द्वारा उसे अपना स्टैंड स्पष्ट करना पड़े। वे इस मामले पर भ्रम बनाए रखना चाहती हैं ताकि बाद में अपना रुख बदल सकें। चूंकि बीजेपी और एनडीए की अन्य पार्टियों ने पहले ही कह दिया था कि वे वोटिंग के लिए तैयार हैं इसलिए यूपीए को डर था कि वोटिंग होने पर वे देश के सामने नंगी हो जाएंगी।
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