आजादी और भारतमाता का सच

क्या भारत माता महज एक मिथ हैं? फिर ऐसा क्यों है कि ‘भारत माता की जय’ का नारा गूंजते ही करोड़ों भारतवासी जोश से भर उठते हैं? भारत माता आज किन झंझावातों से गुजर रही हैं? उन्हें मजबूत और खुशहाल बनाने के लिए क्या करना जरूरी है? 65वें स्वतंत्रता दिवस पर विशेष..।

अंग्रेजी के चश्मे से दुनिया को देखने वालों के लिए ‘मदर इंडिया’ एक मिथक है। भारत के करोड़ों जनसाधारण के लिए भारत माता मिथ नहीं, असलियत हैं। बंकिमचंद्र चटर्जी के शानदार गीत ‘वंदे मातरम’ में हिमालय भारत माता का मुकुट है और सुजलाम नदियां गले में हार की तरह उसकी शोभा बढ़ा रही हैं। सिंह पर सवार भारत माता पुरस्कृत करने की शक्ति और दंड देने के हुनर से लैस हैं। वह श्रृद्धा जगाती हैं, उपासना के लिए प्रेरित करती हैं। कोई उनसे छेड़छाड़ नहीं कर सकता। भला किसकी मजाल है?

भारत माता मिथ हो सकती हैं। दिमाग मिथ नहीं, वास्तविक है। एक अरब दिमागों का भारत माता में विश्वास करना एक अरब वास्तविकता है, फिर भले ही खुद भारत माता मिथ हों।
‘अखंडता’ और ‘प्रभुता’ भारी-भरकम शब्द हैं जिनके अर्थ के लिए शब्दकोश का सहारा लेना पड़ सकता है। लेकिन जब इन पर खतरा मंडराता है, तब आम आदमी गरजने लगता है - ‘भारत मां की कसम.. किसी ने मेरे देश पर बुरी निगाह डालने की जुर्रत की तो..।’ भारत माता की अवधारणा लोगों को राष्ट्र के प्रति गौरव के धागे से बांधती है। इतना ही अटूट बंधन वह जमीन के साथ जोड़ती है।
एक स्तर पर भारत माता अतिनाटकीय सांस्कृतिक कलाकृति हैं। लेकिन दूसरे जीवंत स्तर पर वह दिल की धड़कन हैं। वह हमारी आत्म का आंतरिक शक्ति स्रोत हैं।

हरेक इंसान को, खासकर जब वह राष्ट्र-राज्य का नागरिक होता है, एक आंतरिक शक्ति स्रोत की जरूरत होती है। चाहे वह विचार हो, विश्वास हो, एक मिथक का गुणांक हो या मिथक ही हो। इसी के सहारे वह अपने एक व्यक्ति होने और एक नागरिक होने के दोहरे दायित्व को संभालता है। भारत माता भी ऐसा ही शक्तिस्रोत है और मजबूत, अजेय स्रोत है। इसमें माता ने आत्मज्ञान की बुनियादी जरूरत को तृप्त किया है और भू-राजनीतिक भारत ने सामाजिक परिभाषा की जरूरत को। सभी शक्तिस्रोतों की तरह भारत माता उपेक्षा की शिकार हैं और दोहन व शोषण की भी।

भारत माता ने शब्द के रूप में भी और विचार के रूप में भी अपने इतिहास के महान क्षणों के दौरान, भीषण भावनात्मक उथल-पुथल के वक्तों में, अपनी सुस्ती में, अपनी जागृति में, अपने चूर कर देने वाले संघर्षो में और अपनी शानदार विजयों में अपनी कुछ विलक्षण संतानों को प्रेरित और ऊर्जस्वित किया है। नेताजी पर अपनी नई किताब में सुगाता बसु हमें बताती हैं कि किस तरह बाल सुभाष ने अपनी मां से पूछा था, ‘..क्या भारत माता को कोई बेटा अपने स्वार्थो को पूरी तरह अनदेखा करके समूचा जीवन मां की खातिर न्योछावर नहीं करेगा?’

हम अपने नायकों और नायिकाओं को याद करें तो हैरान रह जाएंगे कि उस माहौल में कैसी महान प्रतिभाएं हुई थीं, कैसा विजन था उनका उस जमाने में, नेता और जनता के बीच कैसा विश्वास का रिश्ता था, वे एक दूसरे में किस तरह आस्था का निवेश करते थे, उनकी कही गई बात का कैसा वजन और पवित्रता होती थी, किस तरह वचन निभाए जाते थे। सबसे बढ़कर इस बात से कि पैसे को उस दौर में उतना ही महत्व हासिल था जितने का वह हकदार था। उसे जन सेवा में, परोपकार के कामों में, यहां तक कि ठोस निवेश में भी लगाया जाता था। लेकिन सबसे ज्यादा हैरान होंगे हम यह देखकर कि उसके आगे लगे शून्यों को गिना जा सकता था। और जो हाथ उस पैसे को थामते थे, वे कितने जवाबदेह थे।

भारत माता की गूंज तमाम ध्वनियों और स्वरों में सुनाई देती है। कभी कर्कश, कभी सुरीली। कभी मद्घिम, कभी तीव्र। कभी क्षेत्रीय उकसावे के रूप, तो कभी संप्रदाय या जाति के आग्रहों में। कभी विचारधारा के शूल में। अंग्रेजीदां देशवासियों के लिए ‘मदर इंडिया’ में बिजली की जितनी कमी हो, जनसाधारण को ‘भारत माता की जय’ में जबरदस्त बिजली धड़कती महसूस होती है। इसमें बीते सालों की वर्षगांठों और मौजूदा वचनबद्घताओं का ताप तो है ही, आने वाले कल के जन्मदिनों और नई व्यवस्था के उद्घाटन की रौशनी भी है। चाहे वह ट्रेड यूनियनों की रैली हो, या राजनीतिक जुलूस या कोई गैर-राजनीतिक जन-अभियान हो, ‘भारत माता की जय’ की गूंज उस विशिष्ट मांग को ज्यादा बड़े वजूद से, स्वर को सप्तस्वर से, जोड़ देती है। उसमें भाग लेने वाला महसूस करता है कि वह उच्चतर नियति से जुड़ा है।

भारत माता की जय बहुत पुराना नारा है, लेकिन उसमें जान है, हौसला देने वाली बात है। उसमें नई सुनवाई की उम्मीद है, नई तस्वीर का अंदेशा है, नई फिजा की झलक है। मौैजूदा लम्हे से आगे उसमें एक अच्छे घंटे की आशा है। पर हां, उस नारे की दो धार हैं। जब उसका मकसद इंसाफ नहीं कुछ और होता है, उसमें जब किसी और के दिल को दिलदाद नहीं बुजदिल बनाने की कोशिश होती है, किसी और को धमकाने या डराने की साजिश होती है, तो वह नारा सोने से पीतल बन जाता है और पीतल से टिन की सस्ती परत। तब भारत माता भारत की नहीं, कुछ खास भारतीयों की माता बनती दिखती हैं। यह खतरा है।

पंडित नेहरू ने एक बार कहा था कि ‘वर्तमान छुरे की धार है’। आइए देखें भारत माता के वर्तमान के छुरे की धार क्या हैं। यह लम्हा हमारा, जमाना हमारा नाशाद है और अवाम मायूस। उसके चेहरे में खुशी कम और गम ज्यादा है। आंखों में नूर कम और निराशा ज्यादा है। कई मिकराज दामन चीर रहे हैं। उद्योग बरहना हो तो उसको खेती से लड़ाना होता है। खेती बरहना हो तो जमीन में गहरे कुएं खोदने पड़ते हैं जो चूसते जाते हैं भूतल के पानी को, जो नीचे और नीचे जा रहा है, माटीला बन रहा है। कोयला और लोहा चाहिए तो जमीन खोदिए, जंगल गिराइए, आदिवासियों को बेघर बनाइए। माटी कब तक और कितना सहेगी?

प्रगतियां आती हैं दुर्गतियों के साथ। संयोग से, योग से, उद्योग से, उपयोग बने, उससे पहले उसके दुरुपयोग की संभावनाएं दिख जाती हैं। रफ्तारियां आती हैं तो गिरफ्तारियों के साथ। खेल खेले गए हैं और वो भी ऐसे वैसे नहीं, राष्ट्रमंडलीय, पूरी दुनिया के सामने।

पहले आचार संहिताएं हुआ करती थीं। आज वे भ्रष्टाचार संहिताएं बनी हुई हैं। कोई उसमें +२ कर रहा है तो कोई डॉक्टरेट। आयकर भरते पहले लगता था कि यह नोच जरूर रहा है पर देश के लिए शुभ है, फर्ज है, देश का कर्ज है। अब लगता है - ढंग से कर चुकाने वाला आदमी सीधा नहीं, भोला है। ईमानदार नहीं, नादान है। काले धन का खुमार है, सफेद झूठ बेशुमार है। मौसम देखें बदल रहा है, हिमगिरि गलकर ढल रहा है। नद और नदियां सूख रही हैं।

पंडित नेहरू का जब निधन हुआ था, अटल जी ने कहा था ‘भारत माता आज शोकमग्न है - उसका सबसे लाडला राजकुमार आज सो गया.. सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूंढना है..।’ आज तारे हैं आकाश पर, लेकिन उनकी रोशनी आ पाती नहीं हताश पर, धुआं जो है बीच में। गुरुदेव के बांग्ला शब्दों में ‘घोर तिमिर घन निबिड़ निशीथे..।’

हमारी आजादी की लड़ाई में भारत माता की अवधारणा ने हमें जादुई उत्साह से भर दिया था। आज हमें उसी अवधारणा को नए सिरे से, नए संदर्भ में गढ़ने की जरूरत है जो हमें इस कोहरे से बाहर निकाल सके। हमें अपने भीतर की सारी शक्ति को बटोरने की जरूरत है। इसमें भारत माता की अवधारणा की शक्ति भी शामिल है जिसे हमने एक तरफ कुलीन पलायनवाद के चलते त्याग दिया और दूसरी तरफ संकीर्ण कट्टर राष्ट्रवाद के कैदखाने में डाल दिया।

अब वक्त आ गया है जब भारत माता के प्रतीक का जो भी अर्थ रहा है और है, उसका सम्मान करें, बल्कि उसे एक नया और समकालीन अर्थ दें और इस तरह कि वह अर्थ उस प्रतीक से ज्यादा महत्वपूर्ण हो। अगर हम ऐसा करते हैं तो एक राष्ट्र और एक सभ्यता के रूप में हमें बहुत लाभ होगा, खासकर तब जब आज हम छुरे की कई धारों पर खड़े हैं।

एक प्रमुख ‘धार’ राष्ट्रीय सुरक्षा है। बेशक भारत माता की सुरक्षा उन लोगों की जिम्मेदारी है जिन्हें यह काम सौंपा गया है, लेकिन यह उसकी सभी संतानों की भी स्वाभाविक और सहज चिंता है। इसमें मीडिया भी शामिल है। यह वह सच्चई है जिसे सुरक्षा से जुड़े रहस्यों की धुंध में भुला दिया गया है।

हमारी भौगोलिक एकता का अर्थ यह है कि हमारी सीमाओं का कोई उल्लंघन न कर सके, तो एक और चीज है जो इतनी ही पवित्र है। वह है जमीन। जमीन के सवाल पर राष्ट्रीय मनोदशा को हम बेहद कम करके आंक रहे हैं। जमीन बहुत सीमित है और हम मानकर चल रहे हैं कि यह ऐसी पूंजी है जिसे विकास, बुनियादी ढांचे और निवेश के लिए हस्तांतर किया जा सकता है। शहरी कुलीनों के दिमाग में इंडिया इनकारपोरेशन की जो छवि है, उसका जनसाधारण के कल्पनालोक में बसी भारत माता से मेल नहीं है।

इस विषय पर अखबार में संपादकीय लिखा जाएगा तो वह इस प्रकार होगा - ‘देश का धन, उसकी धरती सबकी संपत्ति है, कोई पदाधिकारी अथवा उद्योगपति उसका अवैध उपयोग..।’ लेकिन आम आदमी इसे बिल्कुल दूसरे मुहावरे में कहेगा - ‘अरे, मेरा खेत मेरी खेती किसी की मेहरबानी से नहीं मिली है, मेरी मेहनत से बनी है, मेरी जोरू के पसीने से, मेरे और मेरे लड़कों के खून से, कौन है नालायक जो मुझ से इसे छीन सकता है, कौन है वह चूहा, कहां है, जो इसे कुतरना चाहता है, एक हाथ में भी देखूं।’ जमीनों के बड़े पैमाने पर अधिग्रहण और उसमें गड़बड़ियों के खिलाफ जो भावना है, वह कोई गूढ़ बात नहीं, बल्कि राष्ट्रीय धड़कन की अभिव्यक्ति है।

सुनीता नारायण ने इसी बात को पिछले हफ्ते इस तरह कहा है, ‘जहां भी मैं गई, जमीन के अधिग्रहण का विरोध कर रहे लोगों ने मुझसे कहा कि जमीन हमारी मां है, हम इसे बेच नहीं सकते। यह वह भावना है जिसे हम पढ़े-लिखे शहरी हिंदुस्तानी समझ नहीं सकते। हमारे लिए जमीन महज संपत्ति है जिसे हम अपने हित के अनुरूप जब चाहें खरीदते और बेचते हैं। हम उनकी जिद को भी नहीं समझ सकते, क्योंकि हम जमीन पर आधारित काम-धंधों का महत्व नहीं समझते।’

यह सोचना गलत होगा कि रुपयों के लिए हर इंसान जमीन दे ही देगा। हां, गरीबी की वजह से वह मुआवजे के रुपयों की तरफ खिंच सकता है, लेकिन आज हवा बन गई है जो कहती है कि ‘ना भाई, ई हमारी जमीन, ई बिकाऊ नहीं है’। जमीन के साथ उसके रिश्ते में सम्मान की भावना भी शामिल है।

जमीन के स्वामित्व और प्रबंध में जो तथाकथित और वास्तविक सम्मान निहित है, इसी पर महबूब खान ने ‘मदर इंडिया’ बनाई थी। 1957 की इस फिल्म में नरगिस ने यादगार भूमिका की थी। इसने एक स्त्री को संघर्षरत किंतु मुक्तिदाता स्त्रीत्व का प्रतीक बना दिया था। लेकिन मेरी राय में यह फिल्म जमीन पर निर्भर एक परिवार के उस जमीन या संपत्ति से अटूट रिश्ते के बारे में है। यह बताती है कि जमीन से जिसका सबसे पहला हित जुड़ा है, उसके लिए वह न सिर्फ बेशकीमती है, बल्कि उसकी पहचान भी उसी से परिभाषित होती है। इसलिए उसे ताकतवर बनाना जरूरी है। ‘मदर इंडिया’ की राधा की भूमिका में नरगिस यही करती हैं, हालांकि बिल्कुल अलग तरीके से।

यह फिल्म भारत में जमीन के इस्तेमाल के भविष्य के बारे में भी है। जमीन जिसे हासिल करना कठिन है, जिस पर अधिकार कायम रखना और भी कठिन, और गंवा देना बेहद आसान। यह फिल्म आज उस स्थिति का रूपक हो सकती है जिसमें भू-माफियाओं, रीअल्टरों, डेवलपरों और अधिग्रहण करने वालों की जमीन पर निगाह लगी है, जो इस तरह उसकी कीमत बढ़ा रहे हैं ताकि उसे बेचना अनिवार्य हो जाए और खरीदना असंभव। फिल्म यह भी बताती है कि जो चीज जमीन को बेशकीमती बनाती है, वह है ऊपरी मिट्टी की गुणवत्ता। वही मिट्टी आज खतरे में है।

धरती, जिसकी एक और गूंज हमने 1969 के रफी साहब के गाए एक फिल्मी गीत ‘धरती कहे पुकार के’ में सुनी थी, आज अपने घटते हिमनदों और बढ़ते रेगिस्तानों की शक्ल में हांफ रही है। जिस तरह हमें भारत माता की बेटियों के स्वाभाविक स्त्रीधन में उनका हिस्सा सुरक्षित करना है, उसी तरह हमें भारत माता के प्राकृतिक संसाधनों में, खुद उनके स्त्रीधन में, उनका हिस्सा सुरक्षित करना है। आज इन संसाधनों को हड़पने की मारा-मारी मची है। नया भूमि अधिग्रहण कानून लाया जा रहा है। मेरा सुझाव है कि इसका नाम बदलकर भूमि पुन:उपयोग कानून जैसा कुछ रखना चाहिए। इससे भू-उपयोग की अखंडता बनी रहेगी।

धरती या धारित्री से जुड़ा हुआ सवाल है दौहित्री का। जनगणना 2011 की प्रारंभिक रिपोर्ट बताती हैं कि 0-6 आयु समूह में लिंग अनुपात इतना अधिक गड़बड़ा गया है कि आजादी के बाद किसी जनगणना में इतना खराब नहीं रहा। भारत माता की बेटियों को ऐसी मां होना पड़ता है जिनकी ऐसी बेटियां कतई नहीं होनी चाहिए जो उन बेटियों की मां बन सकें जिन्हें जन्म लेने का हक नहीं है। कितनी विचित्र बात है! लेकिन तय मानिए कि पूर्वग्रह से ग्रस्त जो दिमाग लिंग अनुपात के आंकड़ों से चिंतित नहीं है, वह कभी स्वीकार नहीं करेगा कि इज्जत के नाम पर हत्याएं शर्मनाक हैं। वक्त आ गया है अब जमीन के स्वामित्व या पट्टे में औरत के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए कदम उठाना होगा।

जनता आज कुछ गैर-राजनीतिक लोगों की आवाज में ईमानदारी का खरा सोना तलाश रही है जो भारत माता की खातिर आवाज उठा रहे हैं। ‘इंडिया दैट इज भारत’ और ‘वी द पीपुल ऑफ इंडिया’ मिलकर साथ करने के लिए बने हैं। राष्ट्र और देश, निर्वाचित और निर्वाचक, जनप्रतिनिधि और मतदाता अलग-अलग धुरियों पर एक दूसरे के सामने तनकर बैठने के लिए नहीं बने हैं।

भारत माता की हिफाजत और जमीन में उसके हिस्से के अलावा इस प्रतीक में दो बातें और जोड़ने की जरूरत है। वे हैं उसकी बेटियों का दर्जा और उसका पर्यावरण। तभी इस प्रतीक को नया अर्थ और इस अवधारणा को नया मकसद दिया जा सकेगा। तभी भारत माता की विराट शक्ति को संकीर्ण स्वार्थो का बंधक बनाए जाने से रोका जा सकेगा। तभी भारत के प्रति गौरव के हमारे सूख चुके जलस्रोत में नई जलधारा प्रवाहित की जा सकेगी।

मेरी पीढ़ी के कई लोगों को टैगौर की सुंदर कहानी पर 1961 में बनी फिल्म ‘काबुलीवाला’ के लिए प्रेम धवन का लिखा और मन्ना डे का गाया वह गीत याद होगा - ‘ऐ मेरे प्यारे वतन..’। यह कोई साधारण गीत नहीं है। इसमें एक राष्ट्र के व्यक्तित्व का सबसे असाधारण प्रवाह मिलता है। इसमें ‘वतन’ भले ही पुरुष हो, लेकिन वह स्त्रीत्व के गुणों से भी समृद्घ है।

‘तेरे दामन से जो आएं उन हवाओं को सलाम।’ हवाओं की इस छवि से यह गीत हमें आहिस्ता से स्त्रीत्व की छवियों में ले जाता है। अपनी बेटी के पास लौटने को लालायित काबुल का यह बेटा अपने ‘वतन’ की कल्पना करता हुआ गाता है, ‘मां का दिल बनकर कभी सीने से लग जाता है तू.. और कभी नन्ही-सी बेटी बन के याद आता है तू..।’
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