सीएजी ने शीला के साथ पीएमओ को भी घसीटा

कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में हुई अनियमितताओं में प्रधानमंत्री कार्यालय को संलिप्त करते हुए नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ‘गंभीर विरोध’ के बावजूद पीएमओ के कहने पर सुरेश कलमाडी को आयोजन समिति का प्रमुख नियुक्ति किया गया।
रिपोर्ट में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी लपेटते हुए कहा कि दिल्ली की सड़कों पर प्रकाश व्यवस्था में सुधार और उनके सौंदर्यीकरण के लिए उनकी ‘सक्रिय भागीदारी’ में कई निर्णय किए गए। लेकिन प्रकाश व्यवस्था के लिए देसी ल्यूमिनरीज की तुलना में आयातित ल्यूमिनरीज कहीं ज्यादा की लागत पर खरीदे गए।
संसद में शुक्रवार को भारत के नियंत्रक और महालेख परीक्षक (कैग) की 19वें राष्ट्रमंडल खेल 2010 के बारे में पेश रिपोर्ट में यह बात कही गई। कैग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि कहा कि सोचे-समझे उद्देश्य के तहत कृत्रिम जल्दबाजी का माहौल बनाया गया। ऐसा करके निर्धारित सरकारी प्रक्रियाओं में खुली छूट दी गई और देश को उन गतिविधियों, उपकरणों और बुनियादी ढ़ांचे के लिए ऊंची कीमत चुकानी पड़ी, जिनका प्रबंध कम कीमत में किया जा सकता था।
कैग ने यह भी कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों में आयोजन समिति की मुख्य भूमिका थी, लेकिन इस समिति ने जिन व्यक्तियों को प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपी थीं, उनके पास इतने विशाल स्तर की जिम्मेदारियों को निभाने की न तो योग्यता थी और न ही अनुभव।
कैग ने आयोजन समिति द्वारा अधिकतर नियुक्तियां मनमाने तरीके से होने के बारे में अपनी रिपोर्ट में कहा कि समिति ने मानक नियुक्ति प्रक्रियाओं जैसे कि पदों के लिए विज्ञापन, चयन समितियों, सुरक्षा मंजूरियों आदि का भी ख्याल नहीं रखा।
कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दिसम्बर, 2004 में तत्कालीन खेलमंत्री सुनील दत्त के गंभीर विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय की सिफारिश के आधार पर सुरेश कलमाडी को आयोजन समिति का अध्यक्ष बना दिया गया।
इस फैसले ने आयोजन समिति की सरकार नियंत्रित प्रकृति को बदल कर इसे सरकारी नियंत्रण से बाहर करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। समिति की सरकार के प्रति कोई जवाबदेही नहीं रह गई और सरकार के पास भी पारदर्शिता और जिम्मेदारी सुनिश्चित कराने का कोई रास्ता नहीं बचा।
कैग ने रिपोर्ट में अपने निष्कर्ष में कहा, खेल के आयोजन में हुई सभी गतिविधियों की कार्यविधियों से पता चलता है कि निर्णय करने में अस्पष्ट देरी से समयसीमा पर दबाव पड़ा और इस वजह से एक कृत्रिम या सोच समझकर बनाया हुआ जल्दबाजी का माहौल उत्पन्न हुआ।
रिपोर्ट कहती है कि इस जानबूझकर बनाए गए कृत्रिम जल्दबाजी के माहौल के कारण निर्धारित सरकारी प्रक्रियाओं में खुली छूट देनी पड़ी और ऐसा करने से अनुबंध देने की प्रक्रिया को स्पष्ट और निश्चित नुकसान पहुंचा। कई अनुबंधों को एकल निविदा के आधार पर दिया गया और इनमें से कुछ को तो केवल नामांकन के आधार पर ही दे दिया गया।
कैग ने अपने निष्कर्षों में कहा कि पूर्व निर्धारित सरकारी प्रक्रियाओं में दी गई छूट ने प्रतियोगी वातावरण को खत्म करने का काम किया। कैग अपने इस अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से नहीं बच सकता कि ये सब एक सोचे-समझे उद्देश्य के तहत किया गया। प्रतियोगिता के खत्म हो जाने से सरकारी खजाने पर रोके जा सकने वाले भारी खर्च का भार पड़ा।
नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने कहा, पूरे विश्वास के साथ इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि जानबूझकर बनाए गए जल्दबाजी के माहौल और इसकी वजह से उत्पन्न हुई प्रतियोगिता की कमी के कारण देश को उन्हीं गतिविधियों, उपकरणों और बुनियादी ढ़ांचे के लिए ऊंची कीमत चुकानी पड़ी। कैग ने कहा कि ऊंची कीमत चुकाने के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि अंतिम परिणाम वांछित गुणवत्ता वाला था।
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