बैंकों का काम करेंगे डाकघर?

दूर-दराज़ रहने वाले दोस्तों-रिश्तेदारों की ख़ैर ख़बर जानने के लिए चिट्ठी का इंतज़ार करती आँखें...डाक टिकिट के लिए डाकघर के चक्कर....पर इनदिनों शहरी इलाक़ों में लोगों के लिए डाकघर बीते ज़माने की बात होते जा रहे हैं.

ग्रामीण इलाक़ों में डाकघर की सार्थकता बनी हुई है पर मोबाइल वगैरह के आने से कई जगह डाकघर पर निर्भरता कम हो रही है.

बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए भारत सरकार डाकघरों को नए रूप में पेश करने की योजना बना रही है. योजना ये है कि डाकघर अपने मूल काम के अलावा बैंकों के तौर पर भी काम करे.

संचार मंत्रालाय में राज्य मंत्री सचिन पायलट इस योजना और इसकी मंशा के बारे में विस्तार से बताते हैं, "चिट्ठी वगैरह भेजने से डाक विभाग को आय होती थी वो कम हो गई है.समय आ गया है कि भारतीय डाक विभाग का नवीनीकरण किया जाए ताकि डाक विभाग की आमदनी बढ़े और बैंकिंग के सेवा उन लोगों तक पहुँच पाए जो अब तक इससे वंचित हैं."अगर मंत्रालय को बैंक शुरु करने के लिए रिज़र्व बैंक से बैंकिंग लाइसेंस मिल जाता है तो योजना को कैबिनेट के पास भेजा जाएगा.

योजना मंज़ूर होने की सूरत में भारतीय डाक विभाग भारत के सबसे बड़े बैंकों में से एक बन सकता है. लेकिन सवाल ये है कि गाँव-कस्बों में रहने वाले लोगों का इससे क्या मूलभूत फ़ायदे होंगे.

सचिन पायलट बताते हैं, "भारत में साढ़े छह लाख गाँवों में से पाँच फ़ीसदी में ही बैंकों की शाखाएँ खुली हुई हैं. समाज के सभी वर्गों को विकासधारा में तभी शामिल किया जा सकता है जब इन इलाक़ों में बैंक खुलेंगे. ऐसे बैंक जो आसान शर्तों पर किसानों को, छोटे उद्योगपतियों, विद्यार्थियों को ऋण मुहैया करा सके. इन लोगों को अब तक ये सुविधा नहीं मिल पाई है. अगर हमें बैंक लाइसेंस मिलता है तो ये सब काम हम कर पाएँगे."

भारत में कुल एक लाख 55 हज़ार डाकघर हैं जहाँ करीब साढ़े पाँच लाख कर्मचारी हैं.अगर डाक विभाग इस विशाल मौजूदा ढाँचे का इस्तेमाल बैंकिंग के लिए सही तरीके से करता है तो इससे लोगों, ख़ासकर लाखों ग्रामीणों को काफ़ी फ़ायदा पहुँच सकता है.हालांकि इसमें गाँवों तक इंटरनेट पहुँचाने समेत कई चुनौतियाँ भी होंगी.

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